साया 1960 की छाँव और 2026 की धूप
आज 2026 है खिड़कियों से बाहर धूप तो वही है, लेकिन इंसानी मन के भीतर एक अंधेरा छा गया है जिसे दुनिया डिप्रेशन कहती है आज यह शब्द इतना आम हो गया है जैसे कोई मौसमी बुखार हो हर दूसरे घर में, हर दूसरी जुबान पर यह नाम है लेकिन अगर हम वक्त के पहिए को पीछे घुमाकर 1960 के उस दौर में ले जाएं, तो वहां यह बीमारी नहीं, बल्कि बचाव मौजूद था यह किसी धर्म की बात नहीं, यह हर उस भारतीय घर की कहानी है जिसकी नींव रिश्तों से बनी थी शब्द वही, बस अंदाज़ बदल गया 1960 के उस दौर में जब कोई बच्चा पढ़ाई में कमजोर होता या काम से जी चुराता, तो घर के बुजुर्ग बड़े ही देसी अंदाज़ में कहते, "अरे! यह तो निरा निकम्मा है, बैल की तरह बस खाता रहता है, कभी एक चवन्नी का काम भी किया है?" सुनने में यह शब्द आज के दौर में टॉक्सिक लग सकते हैं, लेकिन उस समय इन शब्दों के पीछे एक ढाल खड़ी होती थी आज 2026 में जब इसी बात को करियर फेलियर या एकेडमिक प्रेशर का नाम देकर अंग्रेजी में परोसा जाता है, तो आज की जनरेशन इसे सीधे दिल पर ले लेती है परिणाम? या तो वह खुद को कमरों में बंद कर लेते हैं या फिर अपनी जान लेने जैसा खौफनाक कदम उठा लेते...