बंटी हुई तलवारें: मंदिरों की लूट से देश के विभाजन तक की अनकही सच्चाई
प्राचीन भारत के मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं थे, वे संस्कृति, ज्ञान और अपार संपदा के केंद्र थे दक्षिण के मंदिरों से लेकर सोमनाथ की भव्यता तक, हर पत्थर भारत की समृद्धि की कहानी कहता था लेकिन इस समृद्धि के पीछे एक खोखलापन था—सामाजिक दरार
जब विदेशी आक्रमणकारी भारत की सीमाओं पर खड़े थे, तब भारत के भीतर एक अदृश्य युद्ध चल रहा था समाज ऊंच-नीच के खांचों में इतना बंट चुका था कि राष्ट्र की रक्षा सबकी जिम्मेदारी नहीं रही इतिहास गवाह है कि जब सोमनाथ पर हमला हुआ, तब वहां हजारों लोग मौजूद थे, लेकिन लड़ने वाले मुट्ठी भर थे बाकी लोग इस इंतजार में थे कि चमत्कार होगा या फिर यह सोच रहे थे कि रक्षा करना केवल एक विशेष वर्ग का धर्म है
उदाहरण के तौर पर:
कल्पना कीजिए एक ऐसे घर की जिसकी तिजोरियां सोने से भरी हैं, लेकिन घर के सदस्यों ने आपस में बात करना बंद कर दिया है जब चोर दरवाजा तोड़ता है, तो एक भाई दूसरे की मदद के लिए नहीं आता क्योंकि वह खुद को बड़ा समझता है आक्रमणकारियों ने इसी अहंकार और भेदभाव का फायदा उठाया 10,000 की सेना लाखों की भीड़ को इसलिए रौंद सकी क्योंकि वे एक लक्ष्य के साथ आए थे, जबकि हम अपनी पहचान की लड़ाई में उलझे थे
बंटी हुई तलवारें और लूटी गई विरासत
इस अध्याय में हम उस दर्द को महसूस करेंगे जब आक्रमणकारी मंदिरों की मूर्तियों से हीरे निकाल रहे थे और हमारे पूर्वज अपनी ही जाति की श्रेष्ठता सिद्ध करने में व्यस्त थे जब गजनवी या खिलजी जैसे लोग आए, तो उन्होंने देखा कि भारत एक भौगोलिक इकाई तो है, लेकिन एक मानसिक राष्ट्र नहीं है
इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि एक गांव पर हमला होता था, तो पड़ोसी गांव यह सोचकर चुप रहता था कि "यह मुसीबत मेरे घर नहीं आई" ऊंच-नीच के इस जहर ने हमारी भुजाओं की ताकत छीन ली थी आक्रमणकारियों ने देखा कि यहाँ का समाज इतना बंटा हुआ है कि अगर वे एक जाति को निशाना बनाते हैं, तो दूसरी चुप रहती है यह केवल सोना-चांदी की लूट नहीं थी, यह एक गौरवशाली सभ्यता के आत्मविश्वास की लूट थी
सच्चाई का आईना:
महमूद गजनवी के समय की बात हो या बाद के सुल्तानों की, उनकी सफलता उनकी ताकत से ज्यादा हमारी कमजोरी पर टिकी थी मंदिरों के तहखानों में दबा सोना हमारी रक्षा नहीं कर सका, क्योंकि असली रक्षा एकता के कवच से होती है, जो उस समय टूट चुका था हमारी शक्ति छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित थी, और इतिहास गवाह है कि लकड़ियों का गट्ठर नहीं टूटता, लेकिन अलग-अलग लकड़ियाँ आसानी से जला दी जाती हैं
चालाकी की जड़ें और फिरंगी जाल
जब अंग्रेज व्यापार के बहाने भारत आए, तो उनके पास न तो बड़ी सेना थी और न ही कोई बहुत बड़ी शक्ति लेकिन उनके पास एक सूक्ष्म दृष्टि थी उन्होंने देखा कि भारत के राजा और लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे जहाँ पहले के आक्रमणकारियों ने केवल लूटपाट की थी, अंग्रेजों ने हमारी फूट का व्यापार करना शुरू किया
उन्होंने गौर किया कि एक राजा दूसरे राजा की हार पर जश्न मनाता था, और समाज के भीतर जाति की खाई इतनी गहरी थी कि लोग एक झंडे के नीचे आने को तैयार नहीं थे अंग्रेजों ने महसूस किया कि इस देश को जीतने के लिए खून बहाने से ज्यादा जरूरी है अविश्वास पैदा करना
उदाहरण के तौर पर:
प्लासी का युद्ध (1757) इसका सबसे बड़ा प्रमाण है वहाँ मैदान में हजारों की भारतीय सेना थी, लेकिन आधे से ज्यादा लोग केवल खड़े होकर तमाशा देख रहे थे क्योंकि वे अपनों के ही खिलाफ साजिश रच चुके थे अंग्रेजों ने एक भी गोली चलाए बिना भारत की तकदीर बदल दी, क्योंकि हमने एकता की कीमत पर अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को चुन लिया था यह वह समय था जब भारत की कमजोर नस पूरी दुनिया के सामने नंगी हो गई थी
बांटो और राज करो – एक कानूनी जहर
अंग्रेजों ने समझ लिया था कि भारत की ताकत उसकी विविधता है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी उस विविधता का अहंकार है उन्होंने इसे व्यवस्थित रूप देने के लिए "Divide and Rule" (बांटो और राज करो) की नीति अपनाई उन्होंने इतिहास को इस तरह लिखना शुरू किया जिससे अलग-अलग वर्गों के बीच नफरत और बढ़े
उन्होंने समाज के हर तबके को यह महसूस कराया कि वे एक-दूसरे के दुश्मन हैं मंदिरों से सोना लूटने वाले लुटेरों के बाद, ये वो लोग थे जिन्होंने भारतीयों के मन से एकता का विचार ही लूट लिया जब समाज में ऊंच-नीच की भावना को कानूनी और प्रशासनिक रूप दिया गया, तो आम आदमी राष्ट्र के बारे में सोचना छोड़कर अपनी पहचान बचाने की लड़ाई में उलझ गया
सच्चाई का आईना:
अंग्रेजों की मुट्ठी भर आबादी करोड़ों के भारत पर केवल इसलिए राज कर पाई क्योंकि हम घरों में बंटे थे उन्होंने हमारी सामाजिक बुराइयों को अपनी ढाल बनाया अगर उस समय भारत की जातियों और समुदायों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा होता, तो अंग्रेजों की जहाजें कभी तट तक नहीं पहुँच पातीं हमारी सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि हमने दुश्मन को पहचानने में उतनी देर नहीं की, जितनी अपनों को गले लगाने में कर दी
विश्वास की दरार और विभाजन का बीज
जब अंग्रेजों ने देखा कि उनकी सत्ता डगमगा रही है, तो उन्होंने अपना सबसे घातक कार्ड खेला—धार्मिक और सामाजिक असुरक्षा यह वह दौर था जब मंदिरों की लूट से शुरू हुआ सिलसिला अब मन की लूट तक पहुँच चुका था भारत के भीतर जो ऊंच-नीच और जातिवाद की जड़ें पहले से मौजूद थीं, उन्हें अब राजनीतिक खाद दी गई
एकता की कमी का फायदा उठाकर यह विचार फैलाया गया कि अलग-अलग मान्यताओं के लोग एक साथ रह ही नहीं सकते सदियों का साझा इतिहास, संगीत, और संस्कृति अचानक पराई लगने लगी जब इंसान खुद को राष्ट्र से पहले अपनी विशेष पहचान (जाति या धर्म) से जोड़ने लगता है, तो देश का मानचित्र धुंधला पड़ने लगता है
उदाहरण के तौर पर:
जैसे एक विशाल बरगद का पेड़ तब गिरता है जब उसकी जड़ें अंदर से खोखली हो जाती हैं, वैसे ही भारत का सामाजिक ढांचा खोखला किया गया लोग यह भूल गए कि जब सोमनाथ लूटा गया था या जब अंग्रेजों ने लगान वसूला था, तो दुख सबका साझा था लेकिन राजनीति ने उस दुख को भी बांट दिया, जिससे वह एकता पूरी तरह खत्म हो गई जो किसी भी विदेशी ताकत को उखाड़ फेंकने के लिए काफी थी
अखंडता की हार – पाकिस्तान और बांग्लादेश का जन्म
इतिहास का सबसे बड़ा सबक यह है कि जब हम अपनों के बीच दीवारें खड़ी करते हैं, तो दुश्मन आकर वहां सरहदें बना देता है पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश का बनना केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि यह हमारी उस सदियों पुरानी कमजोरी का नतीजा था जिसकी चर्चा हमने पहले अध्यायों में की
जब हम जाति और वर्ग के नाम पर एक-दूसरे से नफरत कर रहे थे, तब हम यह नहीं देख पाए कि हम एक विशाल भूखंड को खंडित होने की अनुमति दे रहे हैं १०-२० हजार आक्रमणकारियों से हारने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह १९४७ में लाखों अपनों के बिछड़ने पर खत्म हुआ एकता का अभाव इतना प्रबल था कि हमने अपनी ही धरती के टुकड़े होना स्वीकार कर लिया, क्योंकि हम एक-दूसरे पर भरोसा करने की शक्ति खो चुके थे
सच्चाई का आईना:
अगर समाज के हर वर्ग को यह महसूस होता कि यह देश उनका है और वे इस देश के अटूट अंग हैं, तो विभाजन की बात करने वाली आवाजें कभी इतनी बुलंद नहीं हो पातीं अखंड भारत का सपना इसलिए टूटा क्योंकि हमारी सामाजिक एकता की तलवार में जंग लग चुकी थी वह सोना जो मंदिरों से लूटा गया था, शायद वापस आ जाता, लेकिन जो विश्वास और जमीन हमने खोई, उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती
आजादी की सुबह और अतीत की छाया
जब १५ अगस्त १९४७ को सूरज उगा, तो देश में उत्साह तो था, लेकिन भीतर ही भीतर एक डर भी था मंदिरों की लूट और अंग्रेजों की गुलामी ने हमें आर्थिक रूप से तो तोड़ा ही था, लेकिन मानसिक रूप से हमें एक ऐसे समाज में बदल दिया था जहाँ विश्वास की भारी कमी थी आजादी के बाद भी, वही ऊंच-नीच का खेल जारी रहा जिसे आक्रमणकारियों ने हमारी कमजोरी बनाया था
राजनेताओं ने देखा कि अंग्रेजों का बांटो और राज करो का फॉर्मूला बहुत कारगर है बस अब अंग्रेज चले गए थे, लेकिन उनकी सोच यहीं रह गई थी लोकतंत्र में वोट ही वह नया सोना बन गया जिसे लूटने के लिए फिर से समाज को जातियों के नाम पर बांटना शुरू कर दिया गया
उदाहरण के तौर पर:
जैसे पुराने जमाने में १०-२० हजार विदेशी सैनिक आकर हमें लूट ले जाते थे क्योंकि हम एक नहीं थे, वैसे ही आधुनिक समय में मुट्ठी भर चालाक लोग पूरे समाज को आपस में लड़ाकर अपनी सत्ता की रोटियां सेकते रहे लोग देश की तरक्की के बजाय यह देखने लगे कि उनके वर्ग का भला हो रहा है या नहीं यह वही पुराना रास्ता था जो विनाश की ओर ले जाता है
वोट बैंक की राजनीति और सामाजिक बिखराव
इस अध्याय में हम उस कड़वी सच्चाई को देखेंगे जहाँ विकास से ज्यादा अहमियत जातिगत समीकरणों को दी जाने लगी ऊंच-नीच का जो भेदभाव आक्रमणकारियों के लिए रास्ता बनाता था, वही अब देश के भीतर नई दीवारें खड़ी करने लगा जब मंदिरों से सोना लूटा गया था, तब हम बटे हुए थे, और आज जब देश को दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बनना चाहिए, तब भी हम अक्सर आरक्षण या पहचान की लड़ाई में उलझकर अपनी सामूहिक ताकत खो देते हैं
अंग्रेजों ने जो जहर हमारे खून में घोला था, वह समय के साथ और घातक हो गया समाज में आज भी वही मानसिकता दिखती है जहाँ एक भारतीय दूसरे भारतीय की सफलता से ज्यादा उसकी जाति या धर्म को महत्व देता है यह कमजोरी आज भी हमें वैश्विक स्तर पर उतनी मजबूती से खड़ा नहीं होने देती जितनी हमारी जनसंख्या और प्रतिभा का हक है
सच्चाई का आईना:
ताकत हमेशा एकता में होती है, लेकिन हमारा इतिहास गवाह है कि हमने हर बार अपनी ताकत को छोटे-छोटे स्वार्थों में बांट दिया चाहे वह मंदिरों की लूट हो, अंग्रेजों का शासन हो, या आज की राजनीति—दुश्मन हमेशा वही जीतता है जो हमें अलग करना जानता है जब तक हम मैं और मेरी जाति से ऊपर उठकर हम और हमारा राष्ट्र नहीं सोचेंगे, तब
तक इतिहास की गलतियां दोहराई जाती रहेंगी
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