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कोहिनूर: 'रोशनी के पहाड़' की अदृश्य सिसकियाँ और सदियों का प्रतिशोध

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 कोहिनूर: 'रोशनी के पहाड़' की अदृश्य सिसकियाँ और सदियों का प्रतिशोध आंध्र की उस तपती जमीन के नीचे, गोलकुंडा की खदानों में सन्नाटा सिर्फ फावड़ों की आवाज से टूटता था हजारों मजदूर पसीने से तर-बतर, जमीन के सीने को चीरकर कुछ ढूंढने की नाकाम कोशिश कर रहे थे इन्हीं में से एक था 'रामा', जिसकी पुश्तें इसी मिट्टी को खोदते-खोदते इसी मिट्टी में मिल गई थीं उस दिन हवा में एक अजीब सी भारीपन थी, जैसे कुदरत कोई बहुत बड़ा राज खोलने वाली हो रामा का फावड़ा एक ऐसी कठोर सतह से टकराया जिसकी आवाज पत्थर जैसी बिलकुल नहीं थी उसने झुककर अपने कांपते हाथों से कीचड़ और मलबे की परतों को धीरे-धीरे हटाना शुरू किया अंधेरी सुरंग के उस कोने में अचानक एक ऐसी किरण फूटी जिसने रामा की आंखों को चुंधिया दिया वह कोई साधारण पत्थर नहीं था, वह पाताल के हृदय में धड़कता हुआ एक जीता-जागता तारा था रामा की सांसें थम गईं, उसे लगा जैसे उसने साक्षात ईश्वर के किसी अंश को छू लिया है उसने उसे अपनी फटी हुई धोती के कोने में छिपाया, पर उसकी चमक कपड़े के पार जा रही थी उसके मन में डर था—यह पत्थर उसे अमीर बनाएगा या उसकी मौत का कारण ...